वेदों को समझना मुश्किल क्यों है

इस प्रश्न का उत्तर जानने से पहले हमें जानना होगा कि ए-टू-ए व बी-टू-बी व सी-टू-सी  विशेषज्ञों की मंत्रणाएं क्या होती हैं। सर्जन अपनी कांफ्रेंस में आपस में विचार-विमर्श करते हैं । इसमें केवल सर्जन या विषय के विषेशज्ञों को ही शामिल किया जाता है। वे इस काम में प्रशिक्षित होते हैं कि सारी बातों को समझ सकते हैं। इस कांफ्रेंस में मरीजों या आम जनता को शामिल नहीं किया जाता क्योंकि वे उनकी बातों को समझ नहीं पाएंगे कि वे क्या कह रहे हैं। विषय को जानने के लिए सर्जन प्रमाणित होते हैं।

पूरी बातों का विश्लेषण करने के बाद सर्जन आसान भाषा में अपने से जूनियर्स को बताते हैं । इसके बाद जूनियर्स आम भाषा में अपने से आगे लोगों को बताते हैं और फिर वही बातें आम जनता तक पहुंचाने के लिए नुक्कड़ नाटकों, कलाकारों, कहानिकारों, संगीतकारों, मीडिया, विज्ञापनों से बिल्कुल आसान भाषा में लोगों को समझाया जाता है और जागरूकता लाई जाती है।

ऐसा ही वेदों के बारे में है। वेद पहले विषेशज्ञ विचार विमर्श करते हैं फिर उपनिषदों व पुराणों के माध्यम से आगे व्यख्या होती है और फिर आम लोगों तक पहुंचाने के लिए भजन गायक, लोक गायक, नर्तक, कलाकारों आदि सभी माध्यमों का लाभ उठाया जाता है। वेदों की गूढ़ बातों को हर कोई नहीं जान सकता इसलिए प्रमाणित लोग इसे जानते हैं समझते हैं और फिर उसको आसान भाषा में लोगों तक पहुंचाया जाता है।

यही कारण है कि लोग वेदों को न जानते हुए भी वेदों का अनसरण कर रहे होते हैं क्योंकि वेदों का मर्म उनके अंतरमन में आसान भाषा में पहुंचा दिया जाता है। ऐसे ही भारतीय संस्कृति हजारों सालों से एकजुट रही  है। वेदों को जानने के लिए आपका आईक्यू स्तर ऊंचा होना चाहिए और इन्हें परम्परागत गुरु शिष्य परम्परा से आए गुरुओं से ही जानना चाहिए यदि आप किसी गलत व्यक्ति से इसके बारे में जानेंगे तो वह इसके अर्थों को अनर्थ में बदल देगा। 

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