प्रर्यावरण संरक्षण भारतीय व पश्चिमी विचारों का विश्लेषण

प्रर्यावरण संरक्षण भारतीय व पश्चिमी विचारों का विश्लेषण

भारतीय धार्मिक परम्पराओं में इस प्रकृति को ईश्वर की रचना के साथ जोड़ा गया है, प्रकृति शक्ति है, जीवनदायनी है और इसके बिना शिव भी अधूरे हैं। शिव व शक्ति का मेल ही यह प्रकृति है। इस प्रकृति को मां भी कहा गया है क्योंकि यह मां जैसे ही जब प्राणियों का पालन करती है। मां का आदर करना हर प्राणी का परम कर्त्व्य है। हम प्रकृति हर रूप में पूजा करते हैं, हम हरे पेड़ को नहीं काटते क्योंकि उसे काटना निषेध है, धरती पर पांव रखते ही उसे प्रणाम करते हैं, पर्वतों, नदियों को जीवित समझकर उनकी पूजा करते हैं। इतना ही नहीं जीवों को भी पूरा सम्मान देते हैं। हम यह सब इसलिए नहीं करते कि प्रकृति को नुक्सान पहुंचाने से हमें नुक्सान होगा बल्कि हम इसलिए करते हैं कि हम जानते हैं कि प्रकृति है तो हम है और यही ईश्वर का स्वरूप भी है। भारतीय परम्पराओं में प्रकृति को नुक्सान इसलिए नहीं पहुंंचाया जा सकता क्योंकि उसके विशेष अधिकार हैं।

इसके बिल्कुल विपरीत पश्चिमी विचार के अनुसार प्रकृति का स्वयं का कोई अस्तित्व नहीं , इसे जैसे मानव चाहे प्रयोग कर सकता है। आजकल पश्चिम पर्यावरण को बचाने के लिए कई आनंदोलन चल रहे हैं। ये समुद्र में गंदगी फैंकने को मना करते हैं क्योंकि इससे पानी दूषित होता है और मछलियां मर जाती हैंं और मछली उद्योग को नुक्सान होता है। पेड़ों को काटने से इसलिए रोका जाता है कि इससे मानवों को नुक्सान होगा, जंगली जानवरों को मारने पर बैन लगाया जा रहा है वह इसलिए कि इकोसिस्टम का बैलेंस बिगड़ जाएगा और मानवता खतरे में आ जाएगी। इन सबमें मानवीय स्वार्थ को ही सामने रखा गया है। 18 शताब्दि तक पश्चिम में महिलाओं में आत्मा होती है क्या नहीं पर वड़ी बहस हो रही थी, महिलाओं को वोट डालने का भी अधिकार नहीं था, काले गुलामों में आत्मा नहीं मानी जाती थी इसलिए उन्हें कोई अधिकार प्राप्त नहीं थे।

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