महापुरुष संत, महात्मा, भक्त, गुरु व नास्तिक हिन्दू धर्म में न पैदा हुए होते तो क्या होता?
क्या आपने कभी सोचा है कि संत, महात्मा, भक्त ,गुरु व नास्तिक आदि लोग हिन्दू धर्म में न पैदा हुए होते तो क्या होता। भगवान बुद्ध हिन्दू व महावीर जैन क्षत्रिय राज परिवार में पैदा हुए थे। उस समय पूरे भारत में वैदिक धर्म का डंका बजता था। चवार्क भी हिन्दुओं के घरों में पैदा हुए नास्तिक लोग थे जो वैदिक धर्म के घोर विरोधी व नास्तिक थे। चवार्कों ने वैदिक धर्म व ईश्वर की सत्ता के विरोध में बहुत सारे ग्रंथ लिखे जिन्हें नास्तिक आज भी पढ़ते हैं। भारत में कोई भी ग्रंथ लिखा गया चाहे व पक्ष में हो या विरोध में उसेे समाज ने आदर दिया चाहे सहमति हो या न । लेकिन ऐसा कभी नहीं हुआ कि ईश निंदा या धर्म का विरोध करने पर उन्हें पत्थर मार कर मार दिया गया हो या फिर सर कलम कर दिया गया हो। इन लोगों को जनता ने रिजैक्ट कर दिया तो ये लोग क्षीण पड़ गए क्योंकि इनकी विचारधारा से लोग सहमत नहीं थे या इसमेंप्रमाण सहित साक्ष्यों की कमी थी। विरोध करने वाले संतों, महापुरुषों का मौखिक विरोध तो हुआ पर कभी भी उनपर अक्रमण नहीं किया गया। उस समय जब गौतम बुद्ध व महावीर जैन गांवों में पैदल जाते थे तो उनके साथ अंगरक्षक या हथियारबंद सेना नहीं होती थी। लोग उनसे सहमत या असहमत होने पर भी उनका आदर करते थे। उन्हें जहां कहीं भी विरोध का सामना करना पड़ता तो यह मौखिक ही होता।
इस्लामिक काल के दौरान लगभग ज्यादा संत हिन्दू धर्म परिवार में ही पैदा हुए और वे हिन्दू धर्म की कुछ परम्पराओं व धर्म ग्रंथों का विरोध भी करते। आप अंदाजा लगा सकते हैं कि यदि ये सभी संत इस्लाम में पैदा होते और कुरान व इस्लामिक प्रथाओं पर किंतु परंतु करते तो इन्हें ईश निंदा के कथित अपराध के चलते या तो इनको पत्थरों से मार दिया गया होता या सरेआम सर कलम कर दिया गया होता। भारतीय धार्मिक परम्पराओं में ऐसा नहीं है आप असहमत हो सकते हैं लेकिन आपके विचारों का पूरा आदर किया जाता है। भारत में कुछ इस्मामिक सूफी भी हुए लेकिन वे भी इस्लाम पर किंतु-परंतु कहने का साहस न कर सके।
आज भी इस्लामिक देशों में कोई दूसरे धर्म का व्यक्ति अपने धर्म का प्रचार नहीं कर सकता और न ही अपने घर पर ही पूजा कर सकता है। वहां आप यदि दूसरे धर्म के ग्रंथ भी अपने साथ लेकर चलते हैं तो आपको सजा हो सकती है। आप अंदाजा लगाइए हजारों सैंकड़ों साल पहले लोग अन्य विचारधाओं व धर्मों के बारे में कैसा सम्मान रखते होंगे। यदि आपके पास कोई संत पूर्वी यूपी से आ जाए,धोती पहने, तिलक लगाए, काला रंग, साधारण वेशभूषा मैथिली या ब्रज भाषा में में बात करे और आपको कहे कि वह तो आपका संत है तो आप उसको न पहचान पाएंगे और शायद उसपर हंस ही दे। सहिष्णुता की जो भारतीय जनमानस विषेशकर हिन्दू धर्म में है वह कहीं नहीं। ये सारे महापुरूश अरब देशों या ईसाई देशों में क्यों नहीं पैदा हुए। ऐसे महापुरुष तो वहां भी पैदा हो सकते थे। यूरोप में व इस्लामिक देशों में नए विचार पैदा करने का दुस्साहस करने वालों को तो सूली पर लटका दिया गया। लाखों महिलाओं को चुड़ैल घोषित करके जिंदा जला दिया गया।
आज भी हर प्रकार के ग्रंथों की पांडुलिपिओं को सुरक्षित रखा गया है चाहे कुछ ग्रंथों को समाज स्वीकार नहीं करता लेकिन फिर भी उनकी विचारधारा को सम्भाल कर रखा गया है। यही भारतीयता है।
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